आनंद पटवर्धन, घबराहट तुमसे नहीं वैज्ञानिक बौद्ध धर्म से है!

साथी आनंद!

नमस्कार।

बीजेपी की घबराहट तुमसे नहीं वैज्ञानिक बौद्ध धर्म से है। अंबेडकर से और शायद राहुल सांकृत्यायन से भी है।

साथी आप मुझसे ठीक से परिचित न होंगे। वैसे तो आपके द्वारा हर माह एक बेहतरीन डॉक्यूमेंट्री फिल्म का लिंक मुझे और कईयों को भेज दिया जाता है। आपको याद होगा कि आपको मैंने आजादी के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम सचिव, मेरे उत्तराखंड के जिले अल्मोड़ा के कामरेड पी सी जोशी और महात्मा गांधी के बीच हुए पत्र व्यवहारों का एक पीडीएफ भेजा था।

जवाब में आपने बताया था कि बहुत समय के बाद यह चीज आपके सामने दोबारा गुजरी है। वैसे मेरा दुर्भाग्य है कि मैं आपकी कई महत्वपूर्ण फिल्मों को नहीं देख पाया। बहाना क्या बनाएं, नहीं देख पाया।

केवल राम के नाम ( रामजन्म भूमि के विवाद की असलियत दिखाने वाली फिल्म जिसका न केवल इस देश में वरन् अमेरिका तक में प्रदर्शन का विरोध फ़ासिस्टों की एक हिन्दू संस्था ने तीस साल पहले किया था), घोषित वाली और इसलिए कम खतरनाक 1975 की इमरजेंसी पर तैयार की गई फिल्म और अंबेडकर की प्रतिमा की विडंबना करने का विरोध कर रहे दस दलितों की पुलिस फायरिंग के बाद मौतों की पृष्ठभूमि पर तैयार “जय भीम कामरेड ” ही देख पाया।

यूरोप की प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री फिल्म मैगज़ीन डॉक्स द्वारा आपकी फिल्म फादर सन एंड होली वार (पिता , पुत्र एवं धर्म युद्ध ) को 50 सर्वकालिक महान डॉक्यूमेंट्री में गिना जाता है। यह मर्दवाद और सांप्रदायिकता के गठजोड़ को बताती है।

जैसा कि आपकी अन्य फिल्मों के साथ भी हुआ आखिर 11 साल की कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शन को आदेश दिया कि आनंद पटवर्धन की उपरोक्त फिल्म बिना किसी कट के दूरदर्शन पर प्रसारित की जाए।

ये सब डॉक्यूमेंट्री फिल्म यूट्यूब में देखी जा सकती हैं। देखी ही जानी चाहिए।

नव फासीवादी सरकार के राज्य सत्ता के अंगों ख़ास गुलाम नौकरशाहों द्वारा ये बातें सत्तासीन भाजपा को पता चल गई होगी।

5 तारीख को जनचौक में प्रकाशित खबर ने मुझे बेचैन कर दिया तो मैंने पटवर्धन डॉट कॉम पर जाकर आपके बारे में कुछ और भी सुनहरे तथ्यों को नोट किया और कुछ लिखने को प्रवृत्त हुआ। पर निजामुद्दीन से ड्यूटी पर खाचरोद ( उज्जैन) आते हुए मुझे कोई कागज नहीं मिला। सिवाय हमारे मजदूर वर्ग के अखबार नागरिक और थर्ड क्लास एसी के कंबलों के पतले भूरे कागजों के।

खैर, आपको और जनचौक को मेरी पूरी रात की नींद खराब करने के लिए धन्यवाद। अभी अभी देखा कि आपके द्वारा खुद मुम्बई यूनिवर्सिटी में फिल्माई एक पांच मिनट की वीडियो केवल द हिंदू अखबार को शेयर की गई है। वीडियो देखी तो पूरा मामला समझ में आया कि किस तरह एक बौद्ध भिक्षु विमांशा का पीएचडी एडमिशन रद्द कर दिया गया, उनके हॉस्टल पर ताले लगा दिए गए, यहां तक कि नहाने और कपड़े धोने की सुविधाओं से भी वंचित कर दिया गया।

उनका कसूर यह था कि वह पाली भाषा के लिए एक अलग दर्जा और भवन बनाने की मांग कर रहे थे। लेकिन मुंबई यूनिवर्सिटी ने बौद्ध भिक्खु को पिछले छह माह से सत्याग्रह करने पर मजबूर कर दिया है। स्मरण रहे कि संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में बौद्ध धर्म को ग्रहण किया था। सभी दलितों को भी ऐसा करने का संदेश दिया था, और मेरी नजर में तो दलित वर्ग की मुक्ति का एक महान मार्ग दे दिया था।

(अफसोस केवल 1% दलित ही बौद्ध हैं )। आखिर आज तक बौद्ध धर्म जैसा कौन सा दूसरा वैज्ञानिक धर्म है! बकौल मेरे साथी इंकलाबी मजदूर केंद्र के अध्यक्ष रहे कैलाश भट्ट के “महात्मा बुद्ध एक महान वैज्ञानिक थे।” बुद्ध ने संदेश दिया था कि अप्प दीपो भवः यानि अपना दीपक स्वयं बनो। यानि धर्म कोई किताबी चीज नहीं स्वयं अनुभव करने की चीज है। यही संदेश महात्मा बुद्ध , विवेकानंद ने दिया।

यही संदेश भीमराव अंबेडकर ने दिया जब उन्होंने दलितों की मुक्ति के लिए शिक्षित बनने, संगठित रहने और संघर्ष करने के तीन नारे दिए । 

इस्लाम में भी ज्ञान प्राप्ति का आदेश यानि इल्म हासिल करने का संदेश नमाज से भी पहले दिया गया है। स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रतिपादित हिंदू धर्म (भाजपा वाला धर्म कतई अलग है, मूर्ति पूजा वाला है) यानि अद्वैत वेदांत के अर्श तक पहुंची पुस्तक गीता में भी कहा गया है कि हे अर्जुन! ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है!

 अब भला ज्ञान, विज्ञान से हिटलर और उसके सभी देशों के वंशजों की दुश्मनी के बारे में कुछ कहने की भी जरूरत है क्या?? 

सड़क पर सोकर विरोध कर रहे भिक्षु पाली भाषा को स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिलवाने की मांग कर रहे हैं तो क्या गलत है?? राहुल सांकृत्यायन द्वारा बौद्ध धर्म की प्रमुख धार्मिक भाषा में से एक पाली भाषा के ग्रंथों को लाने के लिए कितनी कठिन यात्राएं की गई थी। भिक्खु मुंबई यूनिवर्सिटी के कलिना कैंपस में में संघर्ष कर रहे हैं। यहां तक कि अल्पसंख्यक आयोग भी पाली भाषा हेतु भवन के लिए धन देने को तैयार है, लेकिन मुंबई यूनिवर्सिटी ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और भूमि देने से ही मना कर दिया है।

आखिर भाजपा सरकार आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को दूरदर्शन पर भाषण तो दे सकती है, जैड प्लस सुरक्षा भी दे सकती है पर आनंद पटवर्धन उस समय कलिना कैंपस के पास होने के बावजूद भिक्खू से मिलने मुंबई यूनिवर्सिटी में नहीं आ सकते। क्यों भाई, क्यों कहो तो?? खुद 2024 में सरकार द्वारा पाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला था।

पाली भाषा की बात होगी तो बौद्ध धर्म का जिक्र करना पड़ेगा, राहुल सांकृत्यायन जी के योगदान की बात होगी, हो सकता है पाली भाषा हेतु कार्य करने वाले दो हजार साल पहले के प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु बुद्धघोष का जिक्र करना पड़े, तो पता चलेगा कि वह बिहार के एक ब्राह्मण परिवार से थे।

अब राहुल सांकृत्यायन की बात होगी तो उनके द्वारा सर्वहारा नेता जो सिर्फ स्टालिन पर लिखी उनकी जीवनी की भी बात आने का खतरा है न। फिर मार्क्सवाद , लेनिनवाद , माओ की बात होगी तो?? ये भी कितना बड़ा खतरा है । 

आनंद ! आप मार्क्सवाद और गांधीवाद को मानने वाले ठहरे। 

( वैसे बताते चलें कि खुद कार्ल मार्क्स ने कहा था कि अगर कोई मार्क्सवादी है तो मैं मार्क्सवादी नहीं हूं। दरअसल उन्होंने वैज्ञानिक समाजवाद दिया था जो की द्वंदात्मक भौतिकवाद , ऐतिहासिक भौतिकवाद पर आधारित है।) 

पत्र लंबा है। ड्यूटी पर जाना है। कलम की गलती माफ।

अभी इतना ही।

आप और आप जैसे अमूल्य “जीवित” लोग चिरायु हों!

 आपका 

डॉ उमेश चंदोला 

 खाचरोद (उज्जैन)

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